जंतर मंतर पर तेजस्वी यादव गायब, विपक्षी अनशन में अनुपस्थिति
2026 में दिल्ली जंतर मंतर पर शिक्षा और सड़ते तंत्र के मुद्दे पर विपक्षी आमरण अनशन में राजद नेता तेजस्वी यादव गायब रहे। मीडिया सूत्रों के अनुसार यह गैरमौजूदगी बिहार राजनीति में नई बहस छेड़ गई है जबकि विश्व बैंक डेटा 1.46 बिलियन भारत की आबादी दिखाता है।

2026 में उसी जगह पर विपक्षी नेता आमरण अनशन का समर्थन करने पहुंचे, लेकिन बिहार के सबसे बड़े विपक्षी चेहरे तेजस्वी यादव वहां नजर नहीं आए।
तेजस्वी यादव, जो राजद के नेता हैं, जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में गायब रहे जिसकी चर्चा बिहार की राजनीति में जोरों से हो रही है। मीडिया सूत्रों के अनुसार विपक्षी नेता राजनीतिक नाटक और प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं जबकि बिहार के युवाओं की शिक्षा और रोजमर्रा की शासन व्यवस्था की समस्याओं पर लगातार काम करने की कमी साफ दिख रही है। यह घटना दिखाती है कि आम बिहारवासी के मुद्दों पर जवाबदेही की बजाय हंगामा ज्यादा हो रहा है। आगे यह रिपोर्ट बताएगी कि इस गायब होने का मतलब क्या है, आंकड़े किस तरफ इशारा कर रहे हैं और आम आदमी की जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ रहा है।
क्या हुआ
हाल के दिनों में दिल्ली के जंतर मंतर पर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ। इसमें शिक्षा और दूसरे सड़ते तंत्र के मुद्दों को लेकर आवाज उठाई गई। लेकिन बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के नेता तेजस्वी यादव इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। मीडिया सूत्रों के अनुसार उनकी इस गैरमौजूदगी को ‘लापता’ तेजस्वी के रूप में देखा जा रहा है।
अधिकारियों ने बताया कि इस जगह पर होने वाले प्रदर्शन की खबर बिहार तक पहुंची और वहां की राजनीति में चर्चा का विषय बन गई। उन्होंने लद्दाख के कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से अपना आमरण अनशन यानी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल स्थगित करने की अपील की।
उन्होंने लिखा कि इस संवेदनहीन सरकार से समझने या सच्चे संवाद की उम्मीद बहुत कम है। फिर उन्होंने वादा किया कि शिक्षा और हर सड़ते तंत्र के सवालों को युवा सड़क से संसद तक उठाएंगे। यह पोस्ट आने के बाद भी तेजस्वी यादव का जंतर मंतर पर न पहुंचना विपक्षी एकता पर सवाल खड़ा कर रहा है। बिहार में युवा इस बात को लेकर निराश हैं कि उनके मुद्दे उठाने वाले नेता खुद मौके पर नहीं दिख रहे।
मीडिया सूत्रों के अनुसार इस घटना ने बिहार की राजनीति में नई बहस शुरू कर दी है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या विपक्ष अब सिर्फ बयानबाजी पर निर्भर है।
असली समस्या क्या है
इस घटना से साफ होता है कि बिहार के विपक्षी नेता राजनीतिक नाटक और प्रदर्शनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। लगातार जुड़ाव और जवाबदेही की कमी से रोजमर्रा की शासन विफलताओं को दूर नहीं किया जा रहा। इसका मतलब है कि शिक्षा की खराब स्थिति और दूसरे सिस्टम जो खराब हो चुके हैं उन्हें ठीक करने की बजाय हंगामा ज्यादा हो रहा है।
नतीजा यह कि आम बिहारवासी की रोज की समस्याएं जैसे स्कूलों में टीचरों की कमी, नौकरियों का अभाव और स्वास्थ्य सेवाएं अनदेखी रह जाती हैं। युवा भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उनके मुद्दे सिर्फ भाषणों तक सीमित होकर रह जाते हैं। यही वजह है कि जंतर मंतर जैसे ऐतिहासिक स्थल पर प्रदर्शन तो हो रहे हैं लेकिन असली समाधान की दिशा में काम नहीं दिख रहा। बिहार के युवा और आम नागरिक इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं
विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक भारत की कुल आबादी 1.46 बिलियन है 2025 में। इसी बीच भारत की शहरी आबादी कुल का 35.69 प्रतिशत है 2025 में। यानी सिर्फ एक तिहाई से थोड़ा ज्यादा लोग शहरों में रहते हैं जबकि बाकी ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की सड़ती व्यवस्था से जूझ रहे हैं।
हालांकि भारत की आबादी वृद्धि दर 0.89 प्रतिशत सालाना है 2025 में। इसका मतलब है कि देश की जनसंख्या अब धीरे-धीरे बढ़ रही है लेकिन बिहार जैसे राज्यों में युवाओं की संख्या ज्यादा होने के बावजूद उनके मुद्दों पर विपक्ष का लगातार ध्यान नहीं है। इसके अलावा भारत की जीडीपी वृद्धि 7.57 प्रतिशत है 2025 में। अर्थव्यवस्था अच्छी रफ्तार से बढ़ रही है फिर भी जीडीपी प्रति व्यक्ति सिर्फ 2702 डॉलर है 2025 में। इसका मतलब है कि औसत आदमी की सालाना कमाई बहुत कम है और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि आर्थिक विकास के बावजूद रोजमर्रा की समस्याएं बनी हुई हैं। विपक्ष अगर सिर्फ प्रदर्शन पर ध्यान दे तो इन मुद्दों का समाधान और दूर चला जाएगा।
यह क्यों हुआ — background
राजा जय सिंह द्वितीय ने गणित, वास्तुकला और खगोल विज्ञान में रुचि के चलते जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में ये पांच यंत्र बनवाए थे। आज ये जगहें सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि राजनीतिक प्रदर्शनों का अड्डा भी बन गई हैं। हालांकि इस बार बिहार से जुड़े प्रदर्शन में तेजस्वी यादव की गैरमौजूदगी ने पुरानी घटनाओं की याद दिला दी। पहले भी कई मौकों पर विपक्षी नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन असल में सड़क से संसद तक मुद्दे उठाने में लगातार नहीं रहते।
एक ठोस उदाहरण है बिहार के स्कूलों की हालत। जहां युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं वहां नेता सिर्फ दिल्ली पहुंचकर भाषण दे देते हैं। मीडिया सूत्रों के अनुसार राजद नेता की इस अनुपस्थिति ने पार्टी के अंदर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। युवा कार्यकर्ता अब पूछ रहे हैं कि वादे कब पूरे होंगे।
“आदरणीय सोनम वांगचुक जी, आपसे विनम्र निवेदन है कि अपना आमरण अनशन स्थगित कर दीजिए। इस संवेदनहीन सरकार से आपकी नैतिक लड़ाई को समझने या सच्चे संवाद की उम्मीद बहुत कम है। आपके पीछे खड़े हर युवा को वचन है कि शिक्षा और हर सड़ते तंत्र के सवाल हम सड़क से संसद तक उठायेंगे। जय हिंद!”
भारत पर असर
इस घटना का सबसे ज्यादा असर बिहार के युवाओं पर पड़ रहा है। शिक्षा की सड़ती व्यवस्था और नौकरियों की कमी से उनकी पढ़ाई और भविष्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं। आम नागरिक रोज शासन की विफलताओं से जूझते हैं लेकिन विपक्ष जवाबदेही की बजाय प्रदर्शन पर जोर देता है। इसका मतलब है कि बिहार के परिवारों की बचत स्कूल फीस और कोचिंग पर ज्यादा खर्च हो रही है। सुरक्षा की दृष्टि से भी युवा सड़कों पर प्रदर्शन करते हैं तो कभी-कभी कानून व्यवस्था बिगड़ जाती है।
दिल्ली और दूसरे शहरों के रहने वाले लोग जहां जंतर मंतर जैसे ऐतिहासिक स्थलों को देखने जाते हैं वहां अब ये जगह राजनीतिक हंगामे का केंद्र बन गई है। नतीजा यह कि आम आदमी का भरोसा नेताओं पर और कम हो रहा है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो बिहार में युवाओं की बेरोजगारी बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा।
दूसरा पक्ष
विपक्ष का तर्क है कि प्रदर्शन करना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। जब सरकार संवेदनहीन है और सच्चा संवाद नहीं करती तो सड़क से संसद तक आवाज उठाना जरूरी हो जाता है। तेजस्वी यादव ने भी अपने पोस्ट में यही कहा कि युवाओं के साथ खड़े होकर मुद्दे उठाए जाएंगे। मीडिया सूत्रों के अनुसार कई विपक्षी नेता मानते हैं कि बड़े प्रदर्शन से सरकार पर दबाव बनता है। बिना हंगामे के मुद्दे दब जाते हैं। इसलिए जंतर मंतर जैसे जगहों पर इकट्ठा होना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
यह पक्ष कहता है कि एक नेता का हर कार्यक्रम में मौजूद रहना संभव नहीं होता। तेजस्वी यादव ने ट्वीट करके अपना समर्थन जताया था।
आगे क्या
अगले कुछ हफ्तों में देखना होगा कि तेजस्वी यादव बिहार में इन मुद्दों पर कितना सक्रिय रहते हैं। अगर वे सड़क से लेकर विधानसभा तक शिक्षा और रोजगार के सवाल लगातार उठाते हैं तो विपक्ष की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। सोनम वांगचुक के अनशन को लेकर भी आगे की रणनीति साफ होगी। सरकार अगर संवाद के लिए तैयार होती है तो प्रदर्शन कम हो सकते हैं।
बिहार के युवा अब इंतजार कर रहे हैं कि वादे सिर्फ पोस्ट तक सीमित रहेंगे या असल काम भी दिखेगा। चुनावी साल में यह मुद्दा और गर्म हो सकता है।
मुख्य बातें
- तेजस्वी यादव जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए जिसे उनकी गैरमौजूदगी के रूप में देखा जा रहा है।
- भारत की आबादी 1.46 बिलियन है 2025 में लेकिन जीडीपी प्रति व्यक्ति सिर्फ 2702 डॉलर है जिससे युवाओं की समस्याएं बढ़ रही हैं।
- विपक्ष प्रदर्शन पर जोर दे रहा है जबकि बिहार के आम लोगों को रोज शासन की विफलताओं का सामना करना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
जंतर मंतर पर विरोध की आवाज गूंजी लेकिन बिहार का प्रमुख विपक्षी नेता गायब रहा। आंकड़े बताते हैं कि बढ़ती आबादी और कम आय के बीच शिक्षा और रोजगार की समस्याएं हल होने की बजाय बढ़ रही हैं। विपक्ष अगर नाटक पर अटका रहा तो आम बिहारवासी का भरोसा और टूटेगा। 2026 में भी वे राजनीतिक प्रदर्शनों को देख रहे हैं जहां तेजस्वी यादव जैसी हस्तियां मौजूद नहीं थीं।
अगले हफ्ते बिहार विधानसभा सत्र शुरू होने पर देखना होगा कि ये मुद्दे कितनी गंभीरता से उठाए जाते हैं।
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