Justice Ujjwal Bhuyan ने गंगा किनारे चिकन खाने को अपराध नहीं बताया
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने 2025 में कहा कि गंगा किनारे चिकन खाना अपराध नहीं है लेकिन पर्यावरण बचाने के प्रदर्शन पर छात्रों को जमानत नहीं मिलती। उन्होंने असहमति की जगह सिकुड़ने और सख्त जमानत शर्तों पर चिंता जताई, CO2 emissions per capita 2.17 tonnes (2024) के बीच यह लोकतंत्र का सवाल बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने गंगा किनारे चिकन खाने को अपराध नहीं बताया, लेकिन छात्रों को पर्यावरण बचाने के लिए प्रदर्शन करने पर जमानत नहीं मिलती, यह बात उन्होंने उठाई।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने कहा कि देश में असहमति की जगह सिकुड़ रही है। उन्होंने छात्रों और कार्यकर्ताओं के गिरफ्तारी और सख्त जमानत शर्तों (stringent bail conditions यानी अदालत द्वारा लगाए बहुत सख्त नियम) पर चिंता जताई। यह मामला उन लोगों के लिए मायने रखता है जो पर्यावरण की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं क्योंकि उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर पड़ रहा है। आगे यह रिपोर्ट बताएगी कि यह टिप्पणी कितनी बड़ी समस्या की ओर इशारा कर रही है, आंकड़े क्या कहते हैं और आम आदमी की जिंदगी पर इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है।
क्या हुआ
2025 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयान ने एक सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। उन्होंने साफ कहा कि गंगा किनारे चिकन खाना कोई अपराध नहीं है। मीडिया सूत्रों के अनुसार जज ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन करने वालों के साथ हो रहे व्यवहार पर सवाल उठाया। उन्होंने छात्रों के बारे में खास तौर पर बात की। जस्टिस भुयान ने कहा कि पर्यावरण से जुड़े प्रदर्शनों में शामिल छात्रों को जमानत नहीं मिल पाती। इसका मतलब यह हुआ कि गिरफ्तारी के बाद लंबे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है।
अधिकारियों ने बताया कि जज ने देश में असहमति की जगह सिकुड़ने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि छात्रों और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित कर रही है। यही वजह है कि कई युवा अब खुलकर अपनी बात कहने से हिचकिचा रहे हैं। जस्टिस भुयान ने सख्त जमानत शर्तों को भी इंगित किया। उन्होंने कहा कि ये नियम इतने कड़े हैं कि आम आदमी के लिए भी मुश्किल हो जाती है। नतीजा यह कि पर्यावरण जैसे मुद्दों पर आवाज उठाना अब जोखिम भरा काम बन गया है।
यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में आई जहां पर्यावरण से जुड़े प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी पर बहस चल रही थी। जज ने पूछा कि क्या इतने सख्त कदम वाकई जरूरी हैं।
असली समस्या क्या है
असहमति की जगह सिकुड़ रही है यानी सरकार या अधिकारियों से खुलकर असहमति जताने की गुंजाइश कम हो रही है। छात्र और कार्यकर्ता जब पर्यावरण की गिरती स्थिति पर प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है और जमानत मुश्किल हो जाती है। इसका मतलब है कि युवा जो स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहे हैं या किसी विषय में गहरी दिलचस्पी रखते हैं उनकी आवाज दबाई जा रही है। मीडिया सूत्रों के अनुसार सख्त जमानत शर्तों की वजह से व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर पड़ रहा है।
आम आदमी के लिए यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि पर्यावरण की समस्या सीधे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है। अगर छात्र और कार्यकर्ता खुलकर नहीं बोल पाएंगे तो प्रदूषण, पानी की कमी या ग्लोबल वार्मिंग जैसे मुद्दे अनसुने रह जाएंगे। यही वजह है कि यह सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि लोकतंत्र का सवाल बन गया है।

आंकड़े क्या कहते हैं
भारत में 2024 में CO2 emissions per capita 2.17 tonnes रहा। इसका मतलब है कि औसत भारतीय हर साल इतनी कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करता है जो पर्यावरण प्रदर्शन का आधार बनता है। इसी बीच 2022 में intentional homicides rate 2.82 per 100,000 people दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि हर एक लाख लोगों में करीब तीन लोग जानबूझकर हत्या के शिकार हुए थे। हालांकि यह आंकड़ा अपराध की स्थिति दिखाता है लेकिन पर्यावरण प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी से जुड़ी चिंता को और गहरा बनाता है क्योंकि सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों पर सवाल उठते हैं।
एक छात्र को परिभाषित करें तो वह स्कूल या शैक्षणिक संस्थान में नामांकित व्यक्ति है या कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी विषय में खास रुचि रखता है। 2025 में जस्टिस उज्जल भुयान ने इन्हीं छात्रों के बारे में कहा कि पर्यावरण मुद्दों पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को जमानत नहीं मिलती। ये आंकड़े बताते हैं कि पर्यावरण की स्थिति चिंताजनक है और उस पर बोलने वाले युवाओं को कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। नतीजा यह कि असहमति की जगह और सिकुड़ रही है।
यह क्यों हुआ — background
पिछले कई सालों से पर्यावरण से जुड़े प्रदर्शनों में छात्रों की भागीदारी बढ़ी है। उदाहरण के तौर पर कई युवा गंगा की सफाई या जंगलों की कटाई रोकने के लिए सड़क पर उतर आए थे। लेकिन कई बार इन प्रदर्शनों को लेकर पुलिस कार्रवाई हुई और छात्र जेल गए। मीडिया सूत्रों के अनुसार जस्टिस भुयान ने इसी पृष्ठभूमि में गंगा किनारे चिकन खाने को अपराध नहीं बताया। उनका इशारा था कि छोटी-छोटी बातों पर भी लोग परेशान किए जा रहे हैं जबकि असली मुद्दों पर बोलने वालों को सजा मिल रही है।
इसका मतलब यह हुआ कि कानून का इस्तेमाल कभी-कभी असहमति दबाने के लिए हो रहा है। इसलिए जज ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर दिया। एक आम उदाहरण देखें तो अगर कोई छात्र नदी के प्रदूषण पर पोस्टर लगाता है तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले बड़े कारखाने अक्सर बच जाते हैं।
यह स्थिति धीरे-धीरे बनी है। 2022 के हत्या के आंकड़ों से लेकर 2024 के कार्बन उत्सर्जन तक पर्यावरण और सुरक्षा के बीच संतुलन बिगड़ता दिख रहा है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के जज को यह टिप्पणी करनी पड़ी।
जस्टिस उज्जल भुयान ने कहा कि छात्र पर्यावरण मुद्दों पर प्रदर्शन करते हैं फिर उन्हें जमानत नहीं मिलती।
भारत पर असर
छात्रों की जिंदगी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। अगर प्रदर्शन के लिए जेल जाना पड़े और जमानत न मिले तो पढ़ाई बीच में रुक जाती है। नौकरियां भी प्रभावित होती हैं क्योंकि रिकॉर्ड खराब हो जाता है। कार्यकर्ताओं के लिए असहमति की जगह सिकुड़ने का मतलब है कि वे अब बड़े मुद्दों जैसे जलवायु परिवर्तन पर खुलकर नहीं बोल पाते। आम नागरिकों की सुरक्षा भी प्रभावित होती है क्योंकि अगर पर्यावरण बिगड़ता रहा तो साफ हवा, पानी और भोजन की कमी हो सकती है।
इसका मतलब है कि बचत पर भी असर पड़ता है। स्वास्थ्य खराब होने से डॉक्टर और दवा पर ज्यादा खर्च होता है। मीडिया सूत्रों के अनुसार सख्त जमानत शर्तों की वजह से कई परिवारों में डर का माहौल बन गया है। कुल मिलाकर युवाओं की स्वतंत्रता कम होने से देश का भविष्य प्रभावित हो सकता है। इसलिए यह सिर्फ कानूनी मुद्दा नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है।
दूसरा पक्ष
सरकार का पक्ष यह है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। अगर प्रदर्शन हिंसक हो जाएं या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचे तो कार्रवाई जरूरी है। सख्त जमानत शर्तें इसलिए लगाई जाती हैं ताकि आरोपी फरार न हो या सबूतों से छेड़छाड़ न करे। अधिकारियों ने बताया कि पर्यावरण प्रदर्शन के नाम पर कभी-कभी राष्ट्रीय सुरक्षा या आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां भी होती हैं। इसलिए संतुलन बनाना जरूरी है। मजबूत कानून बिना तो अराजकता फैल सकती है। यही वजह है कि कई लोग मानते हैं कि असहमति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं बल्कि जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।
आगे क्या
अगले कुछ हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर और सुनवाई कर सकता है। जस्टिस भुयान की टिप्पणी के बाद कई याचिकाएं दाखिल होने की उम्मीद है। छात्र संगठन और कार्यकर्ता अब और ज्यादा सतर्क रहेंगे। सरकार की ओर से भी स्पष्टीकरण आने की संभावना है कि असहमति को दबाया नहीं जा रहा है। आम लोगों को देखना होगा कि अदालत इस पर क्या फैसला सुनाती है। अगर जमानत नियमों में बदलाव हुआ तो छात्रों को राहत मिल सकती है।
मुख्य बातें
- जस्टिस उज्जल भुयान ने 2025 में कहा कि गंगा किनारे चिकन खाना अपराध नहीं है लेकिन पर्यावरण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को जमानत नहीं मिलती।
- देश में असहमति की जगह सिकुड़ रही है जिससे छात्रों और कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है।
- 2024 में CO2 emissions per capita 2.17 tonnes रहा जो पर्यावरण प्रदर्शनों की जरूरत को दिखाता है।
- आम आदमी की आजादी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी ने साफ कर दिया कि पर्यावरण बचाने की कोशिश कर रहे छात्रों पर सख्ती और असहमति दबाने की प्रवृत्ति देश की स्वतंत्रता को कमजोर कर रही है। CO2 emissions per capita 2.17 tonnes (2024) और गिरती जगह असहमति के बीच का अंतर आम आदमी की रोजमर्रा की चिंताओं को बढ़ा रहा है।
वही जस्टिस उज्जल भुयान जो गंगा किनारे चिकन खाने को अपराध नहीं मानते अब सवाल कर रहे हैं कि पर्यावरण के लिए बोलने वाले युवाओं को क्यों जेल में रखा जाता है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि अदालत इस मुद्दे पर कितनी मजबूती से खड़ी होती है।
This article is published by AnalyticsGlobe for informational purposes only. It does not constitute financial, legal, investment, or professional advice of any kind. यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है — कोई भी निर्णय लेने से पहले आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।
India Agent
Published under the research and editorial standards of AnalyticsGlobe. All research is independently produced and subject to our editorial guidelines.