फेक Solana TradingView पेज पर JavaScript मालवेयर
बड़े मालवर्टाइजिंग अभियान में फेक Solana, Luno और TradingView पेज बनाकर JavaScript ब्राउज़र मेमोरी में ही मालवेयर तैयार कर रहा है। बिना कोई फाइल डाउनलोड किए 70% भारतीय इंटरनेट यूजर्स खतरे में हैं।

आपका ब्राउज़र खोलते ही एक फेक ट्रेडिंग पेज पर क्लिक, और बिना कोई फाइल डाउनलोड किए ही आपके फोन की मेमोरी में खतरनाक मालवेयर तैयार हो जाता है।
मीडिया सूत्रों के अनुसार एक बड़े मालवर्टाइजिंग अभियान ने फेक Solana, Luno और TradingView वेबपेज बनाए हैं। इन पेजों पर JavaScript (यानी वेबसाइट को इंटरएक्टिव बनाने वाली प्रोग्रामिंग भाषा) ब्राउज़र की मेमोरी में ही मालवेयर (यानी नुकसान पहुंचाने वाला सॉफ्टवेयर) तैयार कर रहा है। आगे की रिपोर्ट बताएगी कि यह कैसे काम करता है, आंकड़े क्या कहते हैं और इससे बचाव कैसे हो सकता है।
मालवर्टाइजिंग कैंपेन में क्या हुआ
मीडिया सूत्रों के अनुसार हमलावरों ने फेक Solana, Luno और TradingView पेज बनाए। इन पेजों पर रखा गया JavaScript ब्राउज़र को निर्देश देता है कि मेमोरी में ही मालवेयर तैयार करे। नतीजा यह कि यूजर को कोई फाइल डाउनलोड करने की जरूरत नहीं पड़ती। सब कुछ ब्राउज़र की अस्थायी मेमोरी में होता है। इसका मतलब है पारंपरिक एंटीवायरस आसानी से पकड़ नहीं पाता क्योंकि कोई फाइल डिस्क पर सेव नहीं होती। हमला रोजमर्रा की ब्राउजिंग के दौरान होता है। खासकर उन लोगों को खतरा है जो क्रिप्टोकरेंसी या ट्रेडिंग साइट्स देखते हैं।
हालांकि यह अभियान बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विज्ञापनों के जरिए ये फेक पेज आम वेबसाइट्स पर भी दिख जाते हैं। इसलिए एक साधारण न्यूज पढ़ते वक्त भी खतरा हो सकता है। इस अभियान में JavaScript का इस्तेमाल खास तरीके से किया गया है। ब्राउज़र खुद मालवेयर को असेंबल करता है। यही वजह है कि यह तरीका पहले से ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है।
असली समस्या क्या है
नतीजा यह कि आम भारतीय रोजाना ब्राउजिंग करते समय बिना जाने सोफिस्टिकेटेड मालवेयर का शिकार हो सकते हैं। मालवर्टाइजिंग का मतलब है ऑनलाइन विज्ञापनों का इस्तेमाल करके मालवेयर फैलाना। ये विज्ञापन अक्सर असली वेबसाइट्स पर दिखते हैं। इस समस्या का सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जो स्मार्टफोन से इंटरनेट चलाते हैं। वे फेक फाइनेंशियल साइट्स पर जा सकते हैं। वहां JavaScript मेमोरी में मालवेयर बनाता है। बिना फाइल डाउनलोड किए ही डिवाइस संक्रमित हो जाता है।
इसका मतलब है बैंक डिटेल्स, पासवर्ड या क्रिप्टो वॉलेट चोरी हो सकता है। आम आदमी को पता भी नहीं चलता कि उसका डिवाइस कब संक्रमित हुआ। यही वजह है कि यह खतरा पहले से ज्यादा गंभीर है।

आंकड़े क्या कहते हैं
इसका मतलब है कि सात में से सात लोगों में से पांच लोग रोज इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं और ऐसे में मालवर्टाइजिंग का खतरा उन तक आसानी से पहुंच सकता है। यानी औसत भारतीय के पास मोबाइल ब्राउजिंग का बहुत अच्छा पहुंच है जहां ऐसे फेक विज्ञापन आसानी से दिख सकते हैं।
इसका मतलब है कि सुरक्षित इंटरनेट ढांचा अभी काफी कम है इसलिए आम लोग अनट्रस्टेड साइट्स पर जाने पर ज्यादा जोखिम उठाते हैं। हालांकि 2020 में भारत का R&D खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.65 प्रतिशत था। इससे पता चलता है कि साइबर सुरक्षा पर शोध और निवेश अभी कम है जो इस तरह के नए हमलों को रोकने में चुनौती खड़ी करता है।
JavaScript का दुरुपयोग क्यों हो रहा है
यह सब 1995 में शुरू हुआ जब Brendan Eich ने JavaScript बनाया। यह भाषा वेबसाइटों को इंटरएक्टिव बनाने के लिए इस्तेमाल होती है। 2025 में JavaScript अभी भी GitHub पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली भाषा है। हालांकि अगस्त 2025 तक TypeScript ने इसे पीछे छोड़ दिया। TypeScript JavaScript का एक सख्त वर्जन है जो टाइप चेकिंग करता है।
एक ठोस उदाहरण लें। पहले मालवेयर डाउनलोड करने के लिए यूजर को फाइल क्लिक करनी पड़ती थी। अब JavaScript ब्राउज़र मेमोरी में ही सब तैयार कर देता है। इसलिए एंटीवायरस को पता नहीं चलता। इसका मतलब है हमलावर अब पुराने तरीकों से आगे निकल गए हैं। वे रोज इस्तेमाल होने वाली भाषा को हथियार बना रहे हैं। यही वजह है कि यह अभियान इतना प्रभावी साबित हो रहा है।
मीडिया सूत्रों के अनुसार JavaScript अब वेब का कोर टेक्नोलॉजी है लेकिन इसका दुरुपयोग मेमोरी में मालवेयर बनाने के लिए हो रहा है।
भारत पर असर
इसका सीधा असर उन भारतीयों पर पड़ रहा है जो रोज इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। ऑनलाइन ट्रेडर्स और क्रिप्टो उत्साही सबसे ज्यादा खतरे में हैं। वे फेक Solana या Luno पेज पर जा सकते हैं। वहां मालवेयर उनके वॉलेट या बैंक अकाउंट तक पहुंच सकता है।
आम आदमी की बचत और सुरक्षा दोनों दांव पर हैं। अगर मालवेयर लग गया तो डेटा चोरी हो सकता है। नौकरियां भी प्रभावित हो सकती हैं अगर काम का डिवाइस संक्रमित हो जाए। इसलिए सावधानी बरतना जरूरी है। JavaScript (वेबसाइट इंटरैक्टिव बनाने वाली भाषा) के दुरुपयोग से बिना फाइल डाउनलोड किए खतरा पैदा हो रहा है।
दूसरा पक्ष
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ब्राउजर कंपनियां पहले से ही इन-मेमोरी हमलों को रोकने के लिए सिक्योरिटी अपडेट जारी कर रही हैं। JavaScript की लोकप्रियता का मतलब है कि इसका इस्तेमाल ज्यादातर अच्छे कामों के लिए होता है। वे कहते हैं कि पूरी तरह इंटरनेट बंद नहीं किया जा सकता। इसलिए यूजर्स को जागरूक होना चाहिए। फेक साइट्स को पहचानने की क्षमता बढ़ाने से खतरा कम किया जा सकता है।
इसके अलावा सिक्योरिटी रिसर्चर्स लगातार नए तरीके ढूंढ रहे हैं। उनका मानना है कि तकनीक के साथ-साथ हमले भी बदलते रहते हैं लेकिन डिफेंस भी मजबूत हो रहा है।
आगे क्या
आने वाले हफ्तों में ब्राउजर अपडेट ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे। यूजर्स को अपने फोन और कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर को हमेशा लेटेस्ट रखना चाहिए। विज्ञापन ब्लॉकर्स का इस्तेमाल बढ़ सकता है क्योंकि मालवर्टाइजिंग विज्ञापनों से फैल रहा है। क्रिप्टो यूजर्स को असली Solana और Luno साइट्स की जांच करनी होगी। भारत में साइबर सुरक्षा जागरूकता अभियान तेज हो सकते हैं। सरकार और कंपनियां मिलकर आम लोगों को सिखा सकती हैं कि फेक पेज कैसे पहचानें।
मुख्य बातें
- मालवर्टाइजिंग कैंपेन फेक Solana, Luno और TradingView पेजों का इस्तेमाल कर रहा है। JavaScript ब्राउजर मेमोरी में मालवेयर तैयार करता है।
- मालवेयर बिना फाइल डाउनलोड किए काम करता है जिससे पारंपरिक एंटीवायरस उसे पकड़ नहीं पाते।
- ट्रेडर्स और मोबाइल यूजर्स सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। अपडेट रखना और सावधानी बरतना जरूरी है।
निष्कर्ष
एक बड़ा मालवर्टाइजिंग अभियान फेक फाइनेंशियल साइट्स के जरिए JavaScript का दुरुपयोग कर ब्राउजर मेमोरी में मालवेयर बना रहा है। कम सिक्योर सर्वर्स और कम R&D खर्च ने स्थिति और जटिल बना दी है।
आपके ब्राउजर में खुलने वाला वह फेक ट्रेडिंग पेज अब सिर्फ एक क्लिक नहीं बल्कि चुपके से चल रहे हमले का द्वार है। इसलिए अगले हफ्ते से अपने ब्राउजर को अपडेट रखें और संदिग्ध विज्ञापनों पर क्लिक करने से पहले दो बार सोचें।
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