असम सरकार ने NEET protesters के मुकदमे वापस लिए
2024 में असम सरकार ने CJP के दबाव में NEET protesters के खिलाफ सभी मुकदमे वापस लेने का फैसला किया। बिहार के बाद यह दूसरा राज्य है जहां exam irregularities के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर लगे मामले बंद कर दिए गए।

साल 2024 में बिहार सरकार ने NEET परीक्षा के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर लगाए गए मुकदमे वापस ले लिए। अब असम सरकार ने भी उसी रास्ते पर चलते हुए दबाव में आकर वही कदम उठा लिया है।
असम सरकार ने NEET protesters के खिलाफ सभी कानूनी मामले वापस लेने का फैसला किया है। यह कदम बिहार के बाद उठाया गया है जहां पहले ही ऐसे मामले वापस लिए जा चुके थे। Citizens for Justice and Peace यानी CJP के लगातार दबाव के चलते दोनों राज्यों ने यह रुख बदला है। इसका मतलब है कि प्रदर्शनकारियों पर कोई नया कार्रवाई नहीं होगी और पूरा मामला बंद माना जाएगा। लेकिन यह फैसला शिक्षा व्यवस्था की गहरी खामियों को छुपा नहीं पाता। यह कहानी उन लाखों छात्रों की है जिनका भविष्य परीक्षा घोटालों से दांव पर लगा है। आगे यह रिपोर्ट बताएगी कि राज्य सरकारें कैसे विरोध को दबाने के लिए मुकदमे दर्ज करती हैं और फिर दबाव में वापस ले लेती हैं।
क्या हुआ
असम सरकार ने NEET protesters के खिलाफ दर्ज सभी मामले वापस लेने का ऐलान किया। मीडिया सूत्रों के अनुसार यह फैसला परिस्थितियों पर गौर करने और system में सुधार की जरूरत को देखते हुए लिया गया। अधिकारियों ने बताया कि सभी registered cases की prompt withdrawal शुरू कर दी जाएगी। इसके साथ ही गिरफ्तारियों की भी समीक्षा होगी। सरकार ने साफ कहा है कि CJP stir में शामिल लोगों के खिलाफ कोई fresh adverse action नहीं लिया जाएगा। पूरा मुद्दा अब closed माना जाएगा और भविष्य में इस पर कोई proceedings नहीं होंगे।
यह कदम बिहार के बाद उठाया गया है। बिहार सरकार ने पहले ही NEET protesters के खिलाफ मामले वापस ले लिए थे। दोनों राज्यों में NEET exam irregularities को लेकर 2024 में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। छात्रों ने परीक्षा में धांधली के आरोप लगाए थे। असम में CJP के दबाव में यह फैसला लिया गया। सूत्रों ने बताया कि सरकार ने सावधानी से विचार किया। नतीजा यह कि अब प्रदर्शनकारियों पर कोई कानूनी साया नहीं रहेगा। लेकिन इस फैसले ने सवाल उठाए हैं कि क्या सरकारें पहले मुकदमे दर्ज कर डराती हैं और फिर जनता के दबाव में पीछे हट जाती हैं।
NEET यानी National Eligibility cum Entrance Test भारत में मेडिकल और संबंधित कोर्स में दाखिले के लिए मुख्य परीक्षा है। CJP यानी Citizens for Justice and Peace एक civil rights group है जो कानून के दुरुपयोग के खिलाफ और protest rights के लिए काम करता है। Withdraws cases का मतलब है सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लगाए गए criminal charges को drop करना।
असली समस्या क्या है
इस घटना से बड़ी समस्या सामने आती है। भारतीय राज्य सरकारें शिक्षा व्यवस्था की खामियों जैसे exam irregularities के खिलाफ protest करने वाले नागरिकों पर criminal cases दर्ज कर उन्हें डराती हैं। फिर public pressure पड़ने पर selectively इन्हें वापस ले लेती हैं। यह तरीका protest rights को कमजोर करता है। छात्र जो अपनी पढ़ाई के भविष्य को लेकर सड़क पर उतरते हैं उन्हें पहले आरोपी बनाया जाता है। बाद में दबाव में मामले वापस लिए जाते हैं। इसका मतलब है rule of law पर भरोसा टूटता है।
सामान्य आदमी के लिए यह मायने रखता है क्योंकि हर छात्र का भविष्य दांव पर लग जाता है। अगर परीक्षा में गड़बड़ी होती है तो लाखों युवा प्रभावित होते हैं। सरकार का यह रवैया उन्हें आवाज उठाने से रोकता है। यही वजह है कि शिक्षा की systemic failures बनी रहती हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं
भारत में adult literacy rate 78.16% (2024) है। इसका मतलब है कि वयस्कों में सिर्फ तीन चौथाई से थोड़ा ज्यादा लोग पढ़ और लिख सकते हैं। इससे कई नागरिक education system की failures को समझने या उन पर सवाल उठाने में असमर्थ रहते हैं। सरकार education spending 4.10% of GDP (2022) करती है। यानी अर्थव्यवस्था का एक मामूली हिस्सा ही स्कूलों पर खर्च होता है। नतीजा यह कि exams जैसे NEET में quality और fairness की समस्याएं बनी रहती हैं और protests आम हो जाते हैं।
tertiary enrolment 34.45% (2025) है। इसका मतलब है कि सिर्फ एक में तीन युवा ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। इसलिए NEET जैसी competitive exams बहुत high-stakes हो जाती हैं। irregularities पर विरोध स्वाभाविक है लेकिन सरकारों का मुकदमा-वापसी वाला रवैया समस्या को हल नहीं करता।
यह क्यों हुआ — background
पिछले सालों में NEET exam irregularities ने कई राज्यों में आंदोलन भड़काए। 2024 से पहले बिहार में बड़े प्रदर्शन हुए जहां छात्रों ने पेपर लीक और अन्य गड़बड़ियों का आरोप लगाया। सरकार ने पहले उन पर cases दर्ज किए फिर वापस ले लिए। असम ने भी उसी पैटर्न को दोहराया। दरअसल CJP के लगातार अभियान ने दोनों राज्यों पर दबाव बनाया। यह civil rights group misuse of law के खिलाफ लड़ती है। नतीजा यह कि असम सरकार ने circumstances और systemic reform needs को देखते हुए यह फैसला लिया। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब सरकारें protest को criminalize करके बाद में पीछे हटती हैं।
एक concrete example लीजिए। फिर चुनाव या बड़े आंदोलन के समय ये मामले शांत हो जाते हैं। इससे आम आदमी को लगता है कि कानून राजनीतिक सुविधा के हिसाब से चलता है। इसलिए शिक्षा spending कम होने और literacy rate 78.16% (2024) रहने के बावजूद युवा सड़कों पर आते हैं। लेकिन सरकारों का रुख inconsistent रहता है।
भारत पर असर
इस घटना का असर NEET aspirants और उनके परिवारों पर सीधा पड़ता है। जो छात्र परीक्षा irregularities के खिलाफ आवाज उठाते हैं उन्हें arrest और legal proceedings का सामना करना पड़ता है। भले ही बाद में मामले वापस ले लिए जाएं लेकिन रिकॉर्ड पर दाग रह जाता है। सामान्य छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है। tertiary enrolment सिर्फ 34.45% (2025) होने से competition पहले ही बहुत ज्यादा है। अगर system में भरोसा नहीं रहा तो युवा निराश हो जाते हैं। इससे उनकी नौकरी की संभावनाएं भी घटती हैं।
परिवारों की बचत और सुरक्षा पर भी असर पड़ता है। मेडिकल सीट के लिए लाखों रुपये खर्च करने के बाद अगर परीक्षा गड़बड़ हुई तो सारा निवेश बर्बाद। सरकार का यह रवैया पूरे education system की credibility को नुकसान पहुंचाता है।
दूसरा पक्ष
सरकारों का तर्क है कि protests के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा हुई थी। इसलिए कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए cases दर्ज करना जरूरी था। अधिकारियों ने बताया कि भीड़ को नियंत्रित करना उनकी जिम्मेदारी है। वे कहते हैं कि systemic reform की बात चल रही है। NEET में सुधार के लिए committees बनाई गई हैं। मामले वापस लेना goodwill का संकेत है ताकि छात्र बिना डर के अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें।
इसके अलावा CJP जैसे groups पर आरोप है कि वे कभी-कभी facts को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। सरकार का मानना है कि सभी राज्यों में अलग-अलग परिस्थितियां होती हैं और हर मामले में सावधानी बरतनी चाहिए।
आगे क्या
अब देखना यह है कि असम और बिहार के बाद अन्य राज्य भी NEET protesters के मामलों पर क्या रुख अपनाते हैं। अगले कुछ हफ्तों में CJP और छात्र संगठन इस फैसले को लेकर और दबाव बना सकते हैं। सरकारें systemic reform पर कितना काम करती हैं यह महत्वपूर्ण होगा। अगर exam irregularities पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो नए protests हो सकते हैं। छात्रों को भी कानूनी सलाह लेनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे मामलों से बचा जा सके।
मीडिया सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार भी NEET को लेकर समीक्षा कर रही है। आने वाले महीनों में कोई नया notification आ सकता है।
मुख्य बातें
- असम सरकार ने NEET protesters के खिलाफ सभी legal cases वापस लेने का फैसला किया है जो बिहार के बाद दूसरा बड़ा कदम है।
- CJP के दबाव में यह फैसला लिया गया है और सरकार ने no fresh action का वादा किया है।
- भारत में tertiary enrolment सिर्फ 34.45% (2025) है जिससे NEET जैसी परीक्षाएं बहुत महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
- सरकारें protest rights को दबाने के लिए cases दर्ज करती हैं फिर pressure में वापस ले लेती हैं जो rule of law को कमजोर करता है।
निष्कर्ष
असम और बिहार दोनों राज्यों ने NEET protesters पर लगे मुकदमे वापस लेकर दिखा दिया कि शिक्षा system की खामियों पर उठे सवालों को पहले दबाया जाता है फिर दबाव में छोड़ दिया जाता है। कम education spending, literacy rate और enrolment के आंकड़े बताते हैं कि समस्या गहरी है। इससे लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है।
वही छात्र जो 2024 में सड़कों पर उतरे थे और जिन पर cases चले थे अब राहत की सांस ले सकते हैं। लेकिन सवाल बाकी है। अगले कुछ हफ्तों में देखना होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें NEET में असली सुधार के लिए क्या ठोस कदम उठाती हैं।
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