AISA नेहा की जंतर मंतर भूख हड़ताल
AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने जंतर मंतर पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। छात्र संगठनों ने शिक्षा में समानता और संस्थागत जवाबदेही की मांग करते हुए यह कदम उठाया जबकि India की adult literacy rate 78.16% (2024) है।

जंतर मंतर पर धूप में बैठी नौजवान लड़की ने जब भूख हड़ताल शुरू की तो उसके साथी सिर्फ पानी पीकर उसका साथ दे रहे थे। AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने कहा कि सरकार की तरफ से कोई सुनवाई नहीं हुई, इसलिए यह कदम उठाना पड़ा।
छात्र संगठनों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू कर दी है। AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने मीडिया सूत्रों के अनुसार बताया कि उन्होंने सारे विकल्प आजमा लिए थे। यह प्रदर्शन शिक्षा में समानता और संस्थागत जवाबदेही की मांग को लेकर है, जो लाखों छात्रों और उनके परिवारों की भविष्य की संभावनाओं को सीधे प्रभावित करता है। आगे यह रिपोर्ट बताएगी कि आंकड़े इस समस्या को कितना गहरा दिखाते हैं और इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ रहा है।
क्या हुआ
हाल ही में AISA के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की। AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने कहा कि उन्होंने सारे विकल्प खत्म कर दिए थे। इसलिए भूख हड़ताल का रास्ता चुना। यह प्रदर्शन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को केंद्र में रखकर किया गया। साथ में CJP यानी Citizens for Justice and Peace नामक नागरिक अधिकार समूह भी इसमें शामिल था। जंतर मंतर वो जगह है जहां अक्सर ऐसे प्रदर्शन होते हैं।
मीडिया सूत्रों के अनुसार छात्र संगठन लंबे समय से शिक्षा नीति और संस्थानों में जवाबदेही की मांग कर रहे थे। लेकिन सरकार की तरफ से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा यह कि कार्यकर्ताओं ने यह कठिन कदम उठाया। नेहा ने स्पष्ट कहा कि हमने सारे रास्ते आजमा लिए थे। अब भूख हड़ताल के अलावा कोई चारा नहीं बचा। यह हड़ताल हाल ही में शुरू हुई है और इसमें कई छात्र शामिल हैं।
प्रदर्शन में शिक्षा की समानता यानी हर बच्चे को बराबर मौका देने की मांग भी शामिल है। छात्रों का कहना है कि बिना जवाबदेही के शिक्षा प्रणाली सुधर नहीं सकती। इसलिए उन्होंने यह रास्ता अपनाया। अधिकारियों ने अभी तक इस हड़ताल पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन छात्रों का प्रदर्शन जारी है। यह घटना दिखाती है कि युवा अपनी मांगों के लिए कितना कुछ दांव पर लगा रहे हैं।
‘We’d exhausted all options; we thought let’s explore hunger strike too’
असली समस्या क्या है
इस घटना से पता चलता है कि छात्र कार्यकर्ता शिक्षा में समानता और संस्थागत जवाबदेही की मांग पर सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए भूख हड़ताल जैसा कठिन कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। दरअसल जब सामान्य तरीके काम नहीं करते तो युवा चरम रास्ता चुन लेते हैं। इसका मतलब है कि शिक्षा व्यवस्था में गहरी खामियां हैं। विश्वविद्यालय के छात्रों को उच्च शिक्षा में दाखिला मिलने में दिक्कत हो रही है। स्कूल जाने वाले बच्चों और उनके परिवारों को भी गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
यही वजह है कि लाखों युवाओं के लिए नौकरियां और बेहतर जीवन के रास्ते बंद हो रहे हैं। अगर सरकार इन मांगों को अनसुना करती रही तो छात्रों का गुस्सा और बढ़ेगा। नतीजा यह कि शिक्षा का अधिकार सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा। आम आदमी के लिए यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि शिक्षा ही बच्चे का भविष्य तय करती है। बिना अच्छी पढ़ाई के नौकरी नहीं मिलती। परिवार की कमाई पर बोझ बढ़ता है।

आंकड़े क्या कहते हैं
भारत में वयस्क साक्षरता दर 78.16% (2024) है। यह संख्या दिखाती है कि शिक्षा की पहुंच अभी भी अधूरी है। यानी देश की कुल आर्थिक गतिविधि का सिर्फ इतना हिस्सा ही सार्वजनिक शिक्षा पर लगाया जाता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे बढ़ाने की जरूरत है।
प्राथमिक स्कूल में कुल नामांकन 111.03% gross (2025) है। इसका मतलब है कि नामांकित बच्चों की संख्या आधिकारिक उम्र के बच्चों से ज्यादा है। अक्सर बड़े या छोटे उम्र के बच्चे भी इसमें शामिल हो जाते हैं। लेकिन उच्च शिक्षा यानी कॉलेज और यूनिवर्सिटी में कुल नामांकन सिर्फ 34.45% gross (2025) है। यानी तीन में से सिर्फ एक युवा ही उच्च शिक्षा पा रहा है। इसका सीधा असर नौकरियों पर पड़ता है।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि भले प्राथमिक स्तर पर संख्या अच्छी लगे लेकिन आगे बढ़ने पर दीवार आ जाती है। इसलिए छात्र संगठन जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
यह क्यों हुआ — background
शिक्षा में समानता की मांग नई नहीं है। सालों से छात्र संगठन सरकार से बेहतर नीतियां और जवाबदेही चाहते आए हैं। AISA जैसा वामपंथी छात्र संगठन लंबे समय से इन मुद्दों पर सक्रिय रहा है। एक ठोस उदाहरण लें। कई बार परीक्षा पेपर लीक या यूनिवर्सिटी में भर्ती में गड़बड़ी की खबरें आती रहती हैं। इससे युवाओं का विश्वास टूटता है। नतीजा यह कि वे सड़क पर उतर आते हैं।
जंतर मंतर पर ऐसे प्रदर्शन अक्सर होते हैं। यहां छात्र अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जब कोई सुनवाई नहीं होती तो भूख हड़ताल जैसा कदम उठाना पड़ता है। पिछले कुछ सालों में शिक्षा खर्च बढ़ाने की मांग बार-बार उठी है। यही वजह है कि उच्च शिक्षा में दाखिला सिर्फ 34.45% (2025) रह गया है।
इसलिए नेहा और उनके साथी कार्यकर्ता कह रहे हैं कि सारे विकल्प खत्म हो गए थे। अब सिर्फ चरम कदम बचा था।
भारत पर असर
इस प्रदर्शन का सीधा असर युवाओं की नौकरियों पर पड़ रहा है। जब उच्च शिक्षा में सिर्फ एक तिहाई युवा पहुंच पाते हैं तो बेरोजगारी बढ़ती है। परिवारों को महंगे प्राइवेट कॉलेजों का खर्च उठाना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों के माता-पिता को चिंता होती है। भले प्राथमिक नामांकन ज्यादा दिखता हो लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता कम होने से बच्चे आगे नहीं बढ़ पाते। इससे पूरा परिवार प्रभावित होता है।
इससे देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। छात्रों की सुरक्षा भी दांव पर है। भूख हड़ताल से स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है। लेकिन वे मानते हैं कि बिना लड़ाई के बदलाव नहीं आएगा। आम युवा की जिंदगी में यह सब कुछ बदल सकता है।
दूसरा पक्ष
सरकार का तर्क है कि शिक्षा पर खर्च लगातार बढ़ाया जा रहा है। प्राथमिक नामांकन 111.03% (2025) होने से पता चलता है कि आधारभूत स्तर पर पहुंच अच्छी है। कई योजनाएं शुरू की गई हैं जो गरीब बच्चों को मदद पहुंचाती हैं। अधिकारियों के अनुसार संस्थागत सुधार चल रहे हैं। नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रावधान हैं। इसलिए भूख हड़ताल जैसी चरम कार्रवाई की जरूरत नहीं है।
सरकार कहती है कि ऐसे प्रदर्शन राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किए जाते हैं। असली काम नीतियों को जमीन पर उतारने का है जो धीरे-धीरे हो रहा है।
आगे क्या
अगले कुछ हफ्तों में देखना होगा कि सरकार इस हड़ताल पर क्या रुख अपनाती है। अगर छात्रों की मांगों पर बातचीत शुरू हुई तो हड़ताल खत्म हो सकती है। अन्य छात्र संगठन भी इसमें शामिल हो सकते हैं। इससे दबाव और बढ़ेगा। शिक्षा मंत्री के कार्यालय से कोई बयान आने की उम्मीद है। युवाओं को देखना होगा कि उनकी आवाज कितनी प्रभावी साबित होती है। अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो ऐसे प्रदर्शन और बढ़ सकते हैं।
मुख्य बातें
- AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा ने कहा कि सारे विकल्प खत्म होने के बाद भूख हड़ताल शुरू की गई। यह जंतर मंतर पर हुई।
- प्रदर्शन में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा में जवाबदेही की मांग शामिल है। CJP भी साथ है।
- उच्च शिक्षा नामांकन सिर्फ 34.45% (2025) है जबकि वयस्क साक्षरता 78.16% (2024) पर अटकी हुई है।
- छात्रों का कहना है कि यह पर्याप्त नहीं।
निष्कर्ष
छात्र कार्यकर्ताओं द्वारा भूख हड़ताल का सहारा लेना शिक्षा व्यवस्था में गहरी खाई को उजागर करता है। कम उच्च शिक्षा पहुंच, अधूरी साक्षरता और जवाबदेही की कमी ने युवाओं को चरम कदम पर मजबूर किया है। आंकड़े साफ बताते हैं कि बुनियादी स्तर पर संख्या भले अच्छी हो लेकिन आगे का रास्ता संकरा है। वही नेहा और उनके साथी जो जंतर मंतर की धूप में भूखे बैठे हैं, आज भी उसी उम्मीद के साथ इंतजार कर रहे हैं कि उनकी आवाज सुनी जाएगी।
अगले हफ्ते सरकार की तरफ से कोई ठोस पहल देखने को मिल सकती है।
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